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SIR में शामिल 'फॉर्म-6' क्या है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद मचा घमासान?
चुनाव आयोग की ओर से SIR प्रक्रिया में शामिल फॉर्म-6 में किए गए बदलावों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद घमासान मच गया है

SIR में शामिल 'फॉर्म-6' क्या है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद मचा घमासान?

Oct 06, 2026
06:22 pm

क्या है खबर?

देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनर्रीक्षण (SIR) पर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। इसके केंद्र में 'फॉर्म-6' नामक वैधानिक दस्तावेज है, जिसमें किए बदलावों ने देश की चुनावी निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए। सोमवार को मामले में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की पीठ ने भी साफ कर दिया कि उसने फॉर्म-6 में किसी भी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है। आइए जानते हैं 'फॉर्म-6' क्या है।

फॉर्म-6

आखिर क्या है 'फॉर्म-6' और इसका महत्व?

फॉर्म-6 मतदाताओं के पंजीकरण नियम, 1960 के तहत एक कानूनी और वैधानिक दस्तावेज है।

देश का कोई भी पात्र नागरिक जो पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाना चाहता है या किसी अन्य निर्वाचन क्षेत्र से अपना नाम स्थानांतरित करवाना चाहता है, तो वह इसी फॉर्म का उपयोग करता है।

नियमों के मुताबिक, इस फॉर्म के मूल ढांचे या शर्तों में कोई भी बदलाव केवल एक उचित कानूनी प्रक्रिया से ही किया जा सकता है।

विवाद

फॉर्म-6 को लेकर क्या है विवाद?

ऑनलाइन पंजीकरण में आवश्यक अतिरिक्त घोषणा के परिणामस्वरूप इस फॉर्म-6 को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।

चुनाव आयोग ने जुलाई में ECINet/ERONet पोर्टल पर ऑनलाइन फॉर्म-6 के साथ पूरक घोषणा पत्र जोड़ दिया था।

उसमें नए आवेदकों के लिए यह घोषणा करना अनिवार्य बना दिया गया कि क्या वे, उनके माता-पिता या उनके दादा-दादी पिछली SIR मतदाता सूची में पंजीकृत थे।

हालांकि, इस घोषणापत्र को अनिवार्य नहीं बताया गया, लेकिन आवेदक इसके बिना ऑनलाइन फॉर्म जमा नहीं कर सकते।

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जानकारी

आयोग ने मतदाताओं को चेतावनी भी दी

दिशानिर्देशों में चेतावनी दी गई है कि घोषणापत्र में झूठा बयान देना लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत दंडनीय है। आयोग के इस संशोधन और चेतावनी को याचिकाकर्ताओं ने नया 'डिजिटल गेटवे' करार दिया है।

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आपत्ति

2 चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म-6 के बदलावों पर जताई आपत्ति

चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस फॉर्म में बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि नियमों में संशोधन किए बिना यह बदलाव नहीं किया जा सकता।

1950 के लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 28 के अनुसार, केवल केंद्र सरकार ही फॉर्म 6 सहित चुनावी फॉर्मों से संबंधित नियमों में संशोधन कर सकती है।

अधिनियम के अंतर्गत बनाया गया प्रत्येक नियम संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष भी रखना अनिवार्य है।

आरोप

विपक्ष ने क्या लगाए आरोप?

चुनाव आयुक्तों की आपत्ति के बाद विपक्ष हमलावर हो गया है। विपक्ष का आरोप है कि फॉर्म-6 में किए गए बदलाव से युवाओं का मतदाता सूची में नाम दर्ज कराना मुश्किल हो गया है।

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि फॉर्म-6 में अनिवार्य रूप से जोड़ा गया वह खंड पहली बार मतदान करने वाली पीढ़ी के मतदाताओं के लिए एक बाधा बन गया है। इसके बाद इस फॉर्म-6 को लेकर पूरे देश में हंगामा मच गया है।

जवाब

चुनाव आयोग ने क्या दिया मामले पर जवाब?

बढ़ते आक्रोश के बीच आयोग ने उन राज्यों में ऑनलाइन फॉर्म-6 से घोषणा हटा दी, जहां संशोधन प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी।

हालांकि, जिन राज्यों में SIR प्रक्रिया जारी थी, वहां घोषणा बनी रही।

26 सितंबर को आयोग ने फॉर्म-6 में घोषणा को शामिल करने के अपने निर्णय को उचित ठहराया।

आयोग ने कहा कि SIR के लिए फॉर्म-6 से जुड़ी घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR से संबंधित मई के अपने फैसले में बरकरार रखा है।

खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के दावे को किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के इस दावे को खारिज कर दिया है।

CJI सूर्यकांत की पीठ ने कहा, "हम यह साफ कर रहे हैं कि फॉर्म-6 में कोई भी संशोधन हमारे द्वारा मंजूर नहीं किया है। रिकॉर्ड पेश होने पर देखेंगे कि बदलाव की हिम्मत किसने की।"

कोर्ट ने कहा कि आयोग के रिकॉर्ड में बदलाव तय कानूनी प्रक्रिया या बहुमत से नहीं मिलने पर कोर्ट इन सभी फैसलों को पूरी तरह से निरस्त कर देगी।

आरोप

मुख्य चुनाव आयुक्त पर एकतरफा फैसले लेने के आरोप

मीडिया रिपोर्ट्स और याचिकाओं के अनुसार, चुनाव आयोग के भीतर ही इस प्रक्रिया को लेकर भारी मतभेद थे।

चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने मतदाता सूचियों के संशोधन और फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर 14 बार रिकॉर्ड पर अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर आरोप है कि उन्होंने बहु-सदस्यीय संस्था के नियमों का उल्लंघन करते हुए इन आपत्तियों को दरकिनार किया और एकतरफा फैसले लागू कर दिए।

असर

आम जनता और लोकतंत्र पर इसका क्या असर पड़ रहा है?

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने चौंकाने वाले आंकड़े देते हुए बताया कि इस नई SIR प्रक्रिया के कारण दिल्ली में करीब 30 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 25 प्रतिशत मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।

जटिल तकनीकी शर्तों और पूर्वजों की मैपिंग की अनिवार्यता के कारण लाखों वैध नागरिक चुनावी चक्र से बाहर हो गए हैं, जिससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में नागरिकों के मताधिकार पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।

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