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फांसी से ही दी जाएगी सजा-ए-मौत, सुप्रीम कोर्ट में 'कम दर्दनाक विकल्प' वाली याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा देने की तरीके को बदलने से फिलहाल इनकार कर दिया है

फांसी से ही दी जाएगी सजा-ए-मौत, सुप्रीम कोर्ट में 'कम दर्दनाक विकल्प' वाली याचिका खारिज

लेखन आबिद खान
Aug 18, 2026
02:16 pm

क्या है खबर?

सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के जरिए मौत की सजा की जगह कम दर्दनाक तरीकों को अपनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। हालांकि, कोर्ट ने सुधार की गुंजाइश बनाए रखी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिका को खारिज करने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में मामले की संवैधानिक समीक्षा नहीं हो सकती। दरअसल, याचिका में मांग की गई थी कि मौत की सजा पाने वाले कैदियों के लिए फांसी के बजाय दूसरा तरीका अपनाया जाए।

कोर्ट

कोर्ट ने कहा- ठोस वैज्ञानिक सबूत मिलने पर दोबारा करेंगे विचार

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिका खारिज कर दी।

पीठ ने कहा, "अगर केंद्र सरकार मौत की सजा देने के तरीके की व्यापक समीक्षा चाहती है और कोई दूसरा तरीका अपनाना चाहती है, तो यह फैसला उसके रास्ते में नहीं आएगा। हमारा फैसला अंतिम नहीं है। अगर मौत की सजा के वैकल्पिक तरीकों के बारे में ठोस वैज्ञानिक सबूत पेश किए जाते हैं तो इस मामले पर फिर विचार किया जा सकता है।"

टिप्पणी

कोर्ट बोला- भविष्य में फिर से विचार करने को तैयार

पीठ ने कहा, "हम यह साफ करना चाहते हैं कि इस याचिका को खारिज करने का मतलब यह नहीं समझा जाना चाहिए कि भविष्य में संवैधानिक जांच का रास्ता बंद हो गया है। अगर ऐसे ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभव-आधारित सबूत सामने आते हैं, जिनसे यह साबित हो कि मामले में जिस तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार पर फैसला लिया गया था, वह बाद की घटनाओं के कारण बदल गया है, तो भविष्य में संवैधानिक जांच हो सकती है।"

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याचिका

याचिका में क्या मांग की गई?

यह याचिका वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर की गई थी। इसमें मांग की गई थी कि मौत की सजा पाए कैदी को फांसी नहीं देना चाहिए, क्योंकि इसमें लंबे समय तक दर्द और तकलीफ होती है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि फांसी की जगह कम दर्दनाक विकल्प जैसे जानलेवा इंजेक्शन, गोली मारने, बिजली का झटका देने या गैस चैंबर जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जाए, जिनसे कैदी की जल्द मौत हो सके।

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तर्क

याचिकाकर्ता ने दिए ये तर्क

याचिकाकर्ता का कहना है कि जब तक व्यक्ति की मृत्यु न हो जाए तब तक गर्दन से लटकाना न केवल बर्बर, अमानवीय और क्रूर है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) की ओर से अपनाए गए प्रस्तावों के भी खिलाफ है।

याचिका में कहा गया है कि फांसी के बाद मृत्यु घोषित करने में लगभग 40 मिनट लगते हैं, जबकि गोली मारने या घातक इंजेक्शन के माध्यम से यह प्रक्रिया लगभग 5 मिनट में पूरी हो जाती है।

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