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IVF से जुड़वा बेटियों को जन्म देने वाले दंपति DNA जांच के बाद क्यों हैं मायूस? 
IVF से जुड़वा बेटियों को जन्म देने वाले दंपति अब लगा रहे कोर्ट के चक्कर

IVF से जुड़वा बेटियों को जन्म देने वाले दंपति DNA जांच के बाद क्यों हैं मायूस? 

लेखन गजेंद्र
Jun 16, 2026
07:50 pm

क्या है खबर?

दिल्ली से जुड़े हरियाणा के गुरूग्राम में रहने वाले राहुल राठौर (41) और उनकी पत्नी मीनू (39) जुड़वा बेटियों को जन्म देने के बाद भी मायूस हैं। दंपति ने जनवरी में इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) से बेटियों को जन्म दिया था, लेकिन उनकी खुशी तब गुम हो गई, जब उनको लगा कि उनकी बेटियां उनके जैसी नहीं लगतीं। इसके बाद उन्होंने DNA टेस्ट कराया और रिपोर्ट देखकर अदालत जाने को मजबूर हो गए। क्या है ये पूरा मामला? आइए जानते हैं।

शुरूआत

क्या है मामला?

दंपति की पहले से 2 बेटियां हैं। उन्होंने परिवार बढ़ाने की सोची, लेकिन उम्र 40 पहुंचने पर IVF अपनाने का फैसला किया। मीनू ने 5 जनवरी, 2026 को जुड़वा बेटियों को जन्म दिया, लेकिन उनके मन में शक हुआ कि बेटियां किसी के जैसी नहीं दिखती। इसके बाद उन्होंने IVF क्लिनिक से DNA टेस्ट करवाने की कोशिश की, लेकिन अस्पताल ने हाथ खड़े कर दिए। इसके बाद दंपति ने 8 जनवरी को 2 स्वतंत्र DNA टेस्टिंग एजेंसियों को सैंपल सौंपे।

रिपोर्ट

DNA रिपोर्ट आने के बाद शुरू हुई अदालती लड़ाई

इसके बाद 10 और 14 जनवरी को DNA रिपोर्ट आई तो जेनेटिक प्रोफ़ाइल से पता चला कि जुड़वां बच्चियों का राहुल या मीनू से कोई जैविक संबंध नहीं था। बच्चे पूरी तरह से अनजान डोनर के एम्ब्रियो थे। इसके बाद दंपति 17 जनवरी को पुलिस के पास गए, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर वे मार्च में कोर्ट चले गए। 23 मार्च को मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट देवांशी जन्मजा ने क्लिनिक के डॉक्टरों के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया।

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आदेश

कोर्ट ने जघन्य अपराध की ओर इशारा किया

दिल्ली की कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करने पर ऐसा लगता है कि सभी तथ्य और हालात मिलकर गंभीर और जघन्य अपराधों की ओर इशारा करते हैं। कोर्ट ने कहा कि ये अपराध सिर्फ धोखाधड़ी और IVF प्रक्रिया के लिए कानूनी गाइडलाइंस का उल्लंघन करने तक सीमित नहीं बल्कि बच्चों की तस्करी-अपहरण की साजिश का भी पता चल सकता है। साकेत कोर्ट ने 30 मार्च को बिना देरी प्राथमिकी दर्ज करने को कहा।

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जवाब

कोर्ट में अस्पताल ने कई तर्क पेश किए

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, IVF हॉस्पिटल ने कहा कि शिकायतकर्ता जोड़े ने अपनी मर्जी से डोनर एम्ब्रियो (भ्रूण) का विकल्प चुना क्योंकि उनके अपने गैमीट्स (शुक्राणु-अंडाणु) निष्प्रयोज्य थे। अस्पताल ने कहा कि प्रक्रिया से पहले, दोनों पक्षों ने 14 मई, 2025 को हलफनामे और फॉर्म-1 के जरिए अनजान डोनर के अंडाणु-शुक्राणु के इस्तेमाल की लिखित मंजूरी दी थी। हालांकि, दंपति ने इसका खंडन किया। मीनू ने सहमति फॉर्म के समय खुद को एनेस्थीसिया में बताया। फॉर्म रजिस्टर तक नहीं था।

खारिज

अस्पताल ने जून में दाखिल की थी रिविजन याचिका

मामला 2 महीने तक लटका रहा। इसके बाद अस्पताल ने 5 जून को साकेत कोर्ट में रिविज़न याचिका दाखिल की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट को रिव्यू करने वाले अस्पताल के रिकॉर्ड में कुछ गड़बड़ी दिखी है, जिससे शिकायत करने वाले जोड़े के आरोपों के सही होने की संभावना बनती है। पुलिस ने बताया कि पिछले महीने SCI अस्पताल के खिलाफ धोखाधड़ी समेत कई धाराओं में FIR दर्ज की गई थी, जिसकी जांच जारी है।

बयान

दंपति ने कहा- बस सच जानना चाहते हैं

राहुल ने कहा, "मैं 5 महीने से जवाब पाने के लिए संघर्ष कर रहा हूं...दोनों मेरी बेटियां ही हैं, जब तक कि उनके असली माता-पिता खुद सामने न आ जाएं...मैं उन्हें बहादुर बनाऊंगा।" मीनू ने कहा, "बच्चे 5 महीने के हो चुके हैं...हमारे पास कागजात हैं। फिर भी कोई हमारी बात सुनने को तैयार नहीं।" उन्होंने कहा, "मुझे 4 महीने तक इंजेक्शन लगवाने पड़े और 9 महीने कोख में पाला। वे बच्चे कौन हैं? मैं बस यही जानना चाहती हूं।"

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