भारतीय स्टार्टअप्स के सामने चिप उत्पादन में क्या आ रही अड़चन?
पिछले साल भारतीय सेमीकंडक्टर स्टार्टअप्स को फंडिंग में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिली, लेकिन उन्हें बड़े पैमाने पर अपना काम आगे बढ़ाने में दिक्कत आ रही है।
2025 में 44 सौदों के जरिए कुल 52.33 करोड़ डॉलर (करीब 5,000 करोड़ रुपये) जुटाए गए, जो एक बड़ी बढ़त थी।
हालांकि, इस साल अब तक फंडिंग की रफ्तार धीमी पड़ गई है। ज्यादातर फंडिंग शुरुआती (सीड) स्टेज के बाद मिलनी बंद हो जाती है।
2023 से अब तक 94 सीड और एंजेल डील्स हुई हैं, जबकि सीरीज A डील्स की संख्या सिर्फ 20 है। अपने आइडिया को एक असली उत्पाद में बदलना अब भी एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है।
100 चिप्स बनाने में ही आता है भारी खर्च
हालांकि, सरकार कुछ उत्पादों को मदद दे रही है, लेकिन चिप बनाना कोई सस्ता काम नहीं है। केवल 100 चिप्स का शुरुआती बैच बनाने में ही करीब 63 करोड़ डॉलर (करीब 6,000 करोड़ रुपये) का खर्च आ जाता है और यह तो पैकेजिंग या टेस्टिंग से पहले की लागत है।
इतनी ज्यादा लागत और बाजार में मांग की अनिश्चितता देखकर निवेशक हिचकिचाते हैं, इसलिए कई लोग इन स्टार्टअप्स में पैसा लगाने से कतराते हैं।
इतना ही नहीं, स्टार्टअप्स को अपने चिप्स की असेंबलिंग और टेस्टिंग के लिए विश्वसनीय साझेदार ढूंढने में भी दिक्कत आ रही है।
इस वजह से किसी प्रोटोटाइप से बड़े पैमाने पर उत्पादन तक पहुंचना और भी कठिन हो जाता है। कुल मिलाकर, भारत के चिप बनाने के सपने को हकीकत में बदलने के लिए सिर्फ अच्छे आइडिया और शुरुआती पूंजी से कहीं ज्यादा की जरूरत है।