मुंह में मौजूद बैक्टीरिया आपको जल्दी सोचने में कर सकते हैं मदद, अध्ययन में हुआ खुलासा
क्या है खबर?
आपको जानकर हैरानी होगी कि जो बैक्टीरिया हमारे मुंह के अंदर मौजूद होते हैं, उनका हमारी सोचने की क्षमता से सीधा संबंध हो सकता है। एक नए अध्ययन के जरिए सामने आया है कि मुंह में पाए जाने वाले बैक्टीरिया का संबंध इस बात से हो सकता है कि आप कितनी तेजी से सोचते हैं। यह अध्ययन यूनाइटेड किंगडम (UK) और बेल्जियम में किया गया है। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
अध्ययन
60 लोग बने थे शोध का हिस्सा
इस अध्ययन को 'प्लस वन' नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया था। व्रीजे यूनिवर्सिटिट ब्रुसेल्स और एक्सेटर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने मिलकर यह अध्ययन पूरा किया और उनका नेतृत्व जोआना ई एल'ह्यूरेक्स ने किया था।
इसमें UK और बेल्जियम के 60 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया गया था, जिनकी जीभ पर पाए जाने वाले कुछ खास तरह के बैक्टीरिया की मात्रा का सीधा संबंध उनकी सोचने-समझने की क्षमता से जुड़ा था।
प्रक्रिया
इस तरह किया गया था शोध
अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 15 युवा और 15 बुजुर्ग लोगों को चुना था। युवा समूह वाले लोग आम तौर पर 20-30 साल की उम्र के थे, जबकि बुजुर्गों की औसत उम्र 60 या 70 साल के आसपास थी।
प्रतिभागियों ने याददाश्त, ध्यान, भावनाओं को पहचानने और प्रोसेसिंग स्पीड से जुड़े टेस्ट पूरे किए। सभी का ब्लड प्रेशर भी मापा गया था और खून, लार और जीभ से स्वैब के सैंपल भी लिए गए थे।
नतीजे
क्या रहे अध्ययन के नतीजे?
स्वैब में मौजूद बैक्टीरिया की पहचान करके, शोधकर्ताओं ने हर व्यक्ति के मुंह के माइक्रोबियल समुदाय की तुलना उनके टेस्ट से की थी। जिन लोगों में 'प्रिवोटेला हिस्टिकोला' नाम का बैक्टीरिया ज्यादा था, उन्होंने कुछ टेस्ट में तेजी से प्रतिक्रिया दी।
'हीमोफिलस पैराइन्फ्लुएंजा' नाम के एक अन्य बैक्टीरिया ने बेल्जियम में भावनाओं को पहचानने और देखकर सीखने वाले कामों में तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद की।
हालांकि, UK में भावनाओं को पहचानने में इसकी प्रतिक्रिया धीमी थी।
अंतर
दोनों देशों के नतीजों में सामने आए ये अंतर
दोनों देशों में ज्यादा उम्र वाले लोगों के दिमागी कामकाज का स्कोर कम था और उनकी प्रतिक्रिया भी धीमी थी। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कम उम्र के और ज्यादा उम्र के वयस्कों में 17 तरह के बैक्टीरिया की मात्रा में अंतर था।
भूगोल का भी अध्ययन के नतीजों पर असर दिखा। दोनों देशों के प्रतिभागियों के बीच बैक्टीरिया के समुदायों में अंतर था।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, फिलहाल इस विषय पर और अध्ययन करने की जरूरत होगी।