केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- नहीं पता कौन पत्रकार है और कौन रील निर्माता
क्या है खबर?
दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शनिवार को हुए प्रदर्शन में महिला पत्रकारों के उत्पीड़न और उनको हिरासत में लेने के मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के सामने वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने महिला पत्रकारों के लिए सुरक्षा उपायों की मांग की। तभी केंद्र सरकार ने विरोध-प्रदर्शन करने वाले पत्रकारों की पहचान पर सवाल उठाए।
सुनवाई
सरकार ने क्या कहा?
केंद्र ने गुरुवार को सवाल उठाया कि प्रदर्शनों को कवर करने वाले कंटेंट क्रिएटर्स से पत्रकारों को कैसे अलग किया जा सकता है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, "इस प्रौद्योगिकी युग में, मोबाइल फोन रखने वाला कोई व्यक्ति पत्रकार हो सकता है। कई लोग माइक लेकर खड़े हैं। वे कहते हैं कि हम रिकॉर्डिंग कर रहे हैं और फिर उसे रील में अपलोड कर देंगे। हमें नहीं पता कि कौन रील बनाने वाला है और कौन स्वतंत्र पत्रकार है।"
आदेश
पत्रकारों की सुरक्षा जरूरी- कोर्ट
न्यायमूर्ति बागची ने सुनवाई के दौरान कहा, "कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आरोप हैं। हम इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या किसी स्वतंत्र एजेंसी को ऐसा करना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस देश के प्रत्येक नागरिक को पत्रकार बनने का अधिकार देती है- इस पर विचार करना चाहिए। चाहे वे मान्यता प्राप्त हों, चाहे वे व्यक्तिगत पत्रकार हों या प्रभावशाली व्यक्ति हों।"
उन्होंने कहा कि व्यापार-पेशे को जारी रखने का अधिकार...पत्रकारों की सुरक्षा और भी आवश्यक है।
बयान
कोर्ट ने आदेश दिया
मेहता ने कहा कि इस सिद्धांत पर कोई असहमति नहीं होनी चाहिए कि महिला पुलिसकर्मियों सहित किसी भी महिला को अभद्रता या दुर्व्यवहार का शिकार नहीं बनाना चाहिए।
कोर्ट ने संकेत दिया कि वह पुलिस द्वारा महिला पत्रकारों पर हमले और उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित करने पर विचार करेगा।
CJI ने कहा कि आरोप गंभीर हैं और सुझाव दिया कि प्रस्तावित पैनल में मुख्य रूप से पूर्व महिला न्यायाधीश और सेवानिवृत्त IPS अधिकारी शामिल होंगे।