भूटान के प्रधानमंत्री हर शनिवार को बन जाते हैं डॉक्टर

दुनिया

10 May 2019

भूटान के प्रधानमंत्री हर शनिवार को बन जाते हैं डॉक्टर, मरीजों का करते हैं ऑपरेशन

भूटान के नेशनल रेफरल अस्पताल में हर शनिवार का दिन बेहद खास होता है। दरअसल, शनिवार को यहां एक खास डॉक्टर आकर मरीजों का ऑपरेशन करते हैं।

इस डॉक्टर का नाम लोटे शेरिंग है। लोेटे शेरिंग सप्ताह के बाकी दिन देश के प्रधानमंत्री होेते हैं और शनिवार को डॉक्टर बन जाते हैं।

शेरिंग ने कहा कि यह उनका तनाव कम करने का तरीका है। उन्होंने कहा कि कोई गोल्फ खेलता है, कोई तीरंदाजी करता है, उन्हें ऑपरेशन करना पसंद है।

तरीका

सामान्य डॉक्टर की तरह काम करते हैं शेरिंग

प्रधानमंत्री शेरिंग जिग्मे दोरजी वांगचुक नेशनल रेफरल हॉस्पिटल में हर शनिवार बतौर सर्जन काम करते हैं।

खास बात यह है कि जब वो अस्पताल में आते हैं तो उनके लिए किसी प्रकार के खास इंतजाम नहीं किए जाते।

अस्पताल के स्टाफ पर भी किसी प्रकार के खास व्यवहार का दवाब नहीं रहता। सब लोग सामान्य तरीके से अपने काम में लगे रहते हैं।

यहां शेरिंग का चिकित्सक के रूप में सेवाएं देना आम बात है।

काम

चुनावी वादा पूरा कर रहे शेरिंग

चुनावी वादा पूरा कर रहे शेरिंग

शेरिंग ने बांग्लादेश, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से अपनी पढ़ाई पूरी की है। वह हर शनिवार को मरीजों का ऑपरेशन करते हैं और हर गुरुवार को ट्रेनिंग पा रहे डॉक्टरों को क्लास देते हैं।

प्रधानमंत्री कार्यालय में उनकी कुर्सी के पीछे हमेशा लैब कोट टंगा रहता है। शेरिंग ने कहा कि इसे देखकर उन्हें अपना वादा याद रहता है जो उन्होंने चुनावों के दौरान किया था।

उन्होंने प्रचार के दौरान चिकित्सा पर ध्यान देने की बात की थी।

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डॉक्टरी और राजनीति एक जैसी- शेरिंग

राजनेता और डॉक्टर की जिम्मेदारी बखूबी निभाने वाले शेरिंग राजनीति को भी डॉक्टरी करने जैसा मानते हैं। उन्होंने कहा, "अस्पताल में मैं मरीज की जांच और इलाज करता हूं। सरकार में मैं नीतियों की सेहत जांचता हूं और उन्हें बेहतर बनाने की कोशिश करता हूं।"

भूटान

कई मामलों में दुनिया से अलग है भूटान

पूरी दुनिया जहां GDP के पीछे लगी है वहीं भूटान में GDP की बजाय लोगों की खुशी का स्तर मापा जाता है।

इसके लिए यहां ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस का इंडेक्स जारी किया जाता है। इस इंडेक्स में पर्यावरण संरक्षण भी शामिल है।

भूटान कार्बन नेगेटिव देश है यानी यहां के वातावरण में सालाना जितनी कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जित होती है, यहां के वनों को उससे ज्यादा कार्बन डाई ऑक्साइड की जरूरत होती है।

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