जानें क्यों टूटा सपा-बसपा का गठबंधन

राजनीति

05 Jun 2019

बुआ मायावती ने क्यों तोड़ा भतीजे अखिलेश के साथ गठबंधन, जानें कहां है उनकी नजर

लोकसभा चुनाव से पहले बना समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंठन टूट गया है।

मायावती ने मंगलवार को घोषणा की कि उनकी पार्टी इस साल के अंत में उत्तर प्रदेश की 11 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव में अकेले दम पर लड़ेगी।

अखिलेश यादव ने भी सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है।

आइए उन चुनावी और राजनीतिक समीकरणों पर एक नजर डालते हैं, जो सपा-बसपा गठबंधन के टूटने का बड़ा कारण रहे।

लोकसभा चुनाव में गठबंधन बुरी तरह फेल

लोकसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगियों ने सपा-बसपा गठबंधन को बुरी तरह से हराते हुए यूपी की 80 में से 64 सीटों पर कब्जा किया। वहीं, गठबंधन को मात्र 15 सीटों प्राप्त हुईं, जिनमें से 10 बसपा और 5 सपा के खाते में गईं।

बयान

मायावती की दलील, यादवों ने नहीं दिया सपा का साथ

मायावती ने क्यों अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया, यह बहुत हद तक उनके बयान से समझा जा सकता है।

उन्होंने लोकसभा चुनाव में गठबंधन के बुरे प्रदर्शन के लिए सपा के यादव वोटबैंक के छिटकने को एक बड़ा कारण बताया।

इसके लिए उन्होंने बदायूं, फिरोजाबाद और कन्नौज का उदाहरण दिया, जहां यादवों का दबदबा होने के बावजूद खुद अखिलेश के परिवार के सदस्य चुनाव हार गए। खुद उनकी पत्नी डिंपल यादव कन्नौज से हार गईं।

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चुनावी आंकड़े

आंकड़े पेश करते हैं दूसरी तस्वीर

वहीं, सपा नेताओं ने कुछ यादव बहुल विधानसभाओं में पीछे रहने के बात स्वीकार की है, लेकिन कहा है कि ये कोई ट्रेंड नहीं है जिसके आधार पर सपा को गठबंधन की असफलता के लिए दोष दिया जा सके।

चुनाव आंकड़ें भी इसी ओर इशारा करते हैं।

बसपा को फतेहपुर सीकरी को छोड़कर हर सीट पर 2014 के मुकाबले ज्यादा वोट हासिल हुए।

ये केवल तभी संभव है, जब सपा के समर्थकों ने बसपा को वोट दिया हो।

सियासी गणित

बिना सपा के वोटों के कैसे जीतीं वाराणसी के आसपास की सीटें?

आंकड़ों के मुताबिक, 11 सीटों पर बसपा प्रत्याशियों को 2014 में सपा-बसपा के संयुक्त वोट शेयर से भी ज्यादा वोट मिले।

जिन 10 सीटों पर बसपा ने जीत दर्ज की, उनमें से 7 इन्हीं 11 सीटों से आईं।

सपा नेताओं का कहना है कि बिना सपा के यादव वोटबैंक के समर्थक के बसपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट वाराणसी के पास स्थित जौनपुर, गाजीपुर और लालगंज सीटों पर जीत नहीं दर्ज कर पाती।

असली कारण

यहां है मायावती की नजर

दरअसल, आंकड़ों के विपरीत अपने इस बयान के जरिए मायावती ने मुस्लिम वोटरों को अपनी तरफ खींचने का पासा फेंका है।

वह मुस्लिम समुदाय को संदेश देना चाहती हैं कि यादव सपा के साथ उतनी मजबूती के साथ नहीं खड़े, जितने दलित बसपा के।

इससे सपा के मुस्लिम-यादव वोटबैंक में फूट पड़ने और मुस्लिमों के बसपा के तरफ आने की उम्मीद है।

बसपा का ज्यादा लोकसभा सीटें जीतना भी मुस्लिमों के उसके प्रति झुकाव को बढ़ा सकता है।

अखिलेश की आलोचना नहीं

दोबारा गठबंधन की उम्मीदों को भी रखा जिंदा

अपने बयान में मायावती ने अखिलेश पर कोई भी हमला नहीं किया, बल्कि कहा कि अखिलेश औऱ डिंपल ने उन्हें बहुत इज्जत दी।

ऐसा करके उन्होंने सपा के साथ फिर से गठबंधन की संभावनाओं को जिंदा रखा है।

राज्य में 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं। अगर उपचुनाव में आजमाया गया ये दांव काम नहीं करता और विधानसभा चुनाव तक भाजपा मजबूत रहती है तो मायावती और अखिलेश दोबारा गठबंधन कर सकते हैं।

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