मायावती की मूर्तियों पर पहले आक्रामक रहे अखिलेश अब शांत

राजनीति

09 Feb 2019

मायावती पर 40 हज़ार करोड़ के घोटाले का आरोप लगाने वाले अखिलेश अब शांत क्यों?

राजनीति में एक कहावत है कि यहां न तो कोई स्थाई दुश्मन है और न ही कोई स्थाई दोस्त।

भाजपा-PDP से लेकर कांग्रेस-AAP और सपा-बसपा तक का गठबंधन इस बात का सबूत है कि राजनीति में कोई भी अछूत नहीं होता।

लेकिन इस तरह की राजनीति अपने साथ कुछ समझौते भी लेकर आती है, जिनमें से मुख्य है अपने साथी की कमियों को नजरअंदाज करना।

मायावती की मूर्तियों पर अखिलेश यादव का रवैया इसका सटीक उदाहरण है।

यू-टर्न

सख्त रवैये से पलटे अखिलेश

दरअसल, 8 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान कहा था कि मायावती को अपनी और हाथियों की मूर्तियों पर हुए खर्च को लौटाना चाहिए।

मायावती से हाल ही में गठबंधन करने वाले अखिलेश से जब इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें मामले की पूरी जानकारी नहीं है और बसपा के वकील कोर्ट में अपनी राय रखेंगे।

उनका यह रवैया इतिहास में मामले पर उनके सख्त रवैये से बिल्कुल उलट है।

विधानसभा चुनाव

2012 विधानसभा चुनाव में बताया था बड़ा घोटाला

2012 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने मूर्तियों पर आए खर्च के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था।

उन्होंने इसे 40,000 करोड़ रुपये का घोटाला करार दिया था।

तब उन्होंने कहा था, "अगर पार्कों के लिए इस्तेमाल की गई जमीन और पार्क के लिए गिराई गई इमारतों की कीमत को मिलाकर देखें तो यह 40,000 करोड़ रुपये का घोटाला है।"

मुलायम सिंह ने तो सरकार आने पर मूर्तियों और स्मारकों को गिराने का वादा किया था।

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नोटिफाई करें

योगी सरकार

योगी सरकार पर किया हमला

अब सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अखिलेश, मायावती पर तो कुछ नहीं बोले, लेकिन भारतीय जनता पार्टी पर जरूर हमला बोला।

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा लोकभवन मेें अटल बिहारी वाजपेयी की 25 फुट की प्रतिमा बनाए जाने के प्रस्ताव पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि यहां भी एक मूर्ति लगने जा रही है।

उन्होंने कहा कि वह भी सपा नेता राम शरन दास की एक प्रतिमा यहां लगवाएंगे।

लखनऊ स्थित लोकभवन मुख्यमंत्री कार्यालय होता है।

गठबंधन

गठबंधन की मजबूरियों का सटीक उदाहरण

अखिलेश का मायावती की मूर्तियों पर बदलता रवैया गठबंधन की राजनीति की मजबूरियों को साफ उजागर करता है।

यह मजबूरियां कभी लोकतंत्र के लिए फायदेमंद साबित होती हैं तो कभी नेताओं के दोगलेपन को उजागर करती हैं, जैसा कि इस मामले में है।

मामले में साफ है कि चुनावी मजबूरी के कारण अखिलेश ने मायावती के खिलाफ अपने एक बड़े मुद्दे को किनारे किया है।

इसके लिए हम कहें कि मजबूरी का नाम 'गठबंधन' है तो गलत नहीं होगा।

लोकसभा चुनाव के लिए सपा-बसपा का गठबंधन

अखिलेश ने हाल ही में लोकसभा चुनाव के लिए मायावती के साथ गठबंधन का ऐलान किया था। दोनों पार्टियां यूपी की 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। गठबंधन ने 1995 गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा-बसपा के बीच शुरु हुई राजनीतिक दुश्मनी पर विराम लगाया है।

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